भोप सिंह एवं मोहर सिंह।
यमुना के ‘देवदूत’: जान की परवाह किए बिना मौत के मुंह से खींच लाए एक दर्जन जिंदगियां
वृंदावन। वृंदावन के केसी घाट पर उस वक्त चीख-पुकार मच गई जब यात्रियों से भरी एक मोटर बोट अचानक अनियंत्रित होकर यमुना की लहरों में समा गई। लेकिन, काल बनकर आई इस आपदा और डूबते लोगों के बीच देवदूत बनकर खड़े हो गए पांटून पुल पर तैनात दो ठेका कर्मीकृ ’’भोप सिंह और मोहर सिंह’’। अपनी जान की बाजी लगाकर इन दोनों वीरों ने जुगाड़ के स्टीमर के जरिए एक दर्जन से अधिक लोगों को नया जीवनदान दिया।
चीख-पुकार सुन मौत से टकरा गए जांबाज
घटना के समय पांटून पुल के पास झोपड़ी में मौजूद भोप सिंह और मोहर सिंह ने जैसे ही लोगों के डूबने की आवाज सुनी, वे बिना एक पल गंवाए बाहर की ओर दौड़े। सामने का मंजर खौफनाक थाकृ मोटर बोट नदी में डूब चुकी थी और लोग लहरों के बीच जिंदगी के लिए छटपटा रहे थे। दोनों ने तुरंत पुल पर खड़े जनरेटर चालित श्जुगाड़ के स्टीमरश् को स्टार्ट किया और उसे सीधे घटनास्थल की ओर मोड़ दिया।
जुगाड़ का स्टीमर और बोट की सीट बनी सहारा
घटनास्थल पर पहुंचते ही भोप और मोहर ने बहादुरी का परिचय देते हुए डूबते हुए लोगों के बाल और कपड़े पकड़-पकड़कर उन्हें खींचना शुरू किया। अनोखा संघर्ष मोटर बोट डूबने के बाद उसकी सीटें उतरकर ऊपर आ गईं, जिन्हें दो महिलाओं ने मजबूती से पकड़ लिया और बहाव के साथ आगे बढ़ने लगीं। हिम्मत का संचार भोप सिंह और उनके साथी ने उन महिलाओं को हिम्मत बंधाई और पहले उन लोगों को सुरक्षित निकाला जिनके पास कोई सहारा नहीं था और जो एक-दूसरे को पकड़कर डूब रहे थे।
सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ी जीत’
भोप सिंह ने बताया कि यदि उस समय पांटून पुल के पास कुछ छोटी नावें उपलब्ध होतीं, तो शायद और भी कई जानें बचाई जा सकती थीं। उन्होंने कहा, ’ष्बड़ी नाव या स्टीमर मुड़ने और जगह लेने में अधिक समय लेते हैं, जबकि डूबते हुए इंसान के लिए एक-एक सेकंड कीमती होता है।ष्’ इस बचाव कार्य में केसी घाट के अन्य नाविकों ने भी मदद की, जिससे एक बड़ी त्रासदी को काफी हद तक टाल दिया गया। आज हर कोई इन दो ठेका कर्मियों के जज्बे को सलाम कर रहा है, जिन्होंने साबित कर दिया कि इंसानियत और बहादुरी के सामने मौत भी हार मान लेती है।



