वृंदावन में रंगजी का ऐतिहासिक रथ मेला, ब्रह्मोत्सव में उमड़ रहा श्रद्धालुओं का जनसैलाब

  • Friday March 13 2026 - 02:15 PM
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  • होली के बाद ब्रज में फिर सजी भक्ति की छटा
  • 7 से 16 मार्च तक रंगजी मंदिर में विशेष उत्सव

वृंदावन। उत्सव भूमि वृंदावन की हर परंपरा अपने आप में अनूठी है। होली के समापन के बाद अब ब्रजवासी प्रसिद्ध रंगजी मंदिर के ब्रह्मोत्सव और रथ मेले में आनंद और भक्ति के साथ सराबोर दिखाई दे रहे हैं। 7 से 16 मार्च तक चलने वाले इस दस दिवसीय उत्सव में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए उमड़ रहे हैं।

दक्षिण भारतीय परंपरा और ब्रज संस्कृति के अद्भुत संगम के रूप में प्रसिद्ध यह मेला इन दिनों पूरे वृन्दावन को भक्तिमय बना रहा है। उत्सव के दौरान भगवान श्री गोदारंगमन्नार की मनोहारी शोभायात्राएँ निकलती हैं, जिनमें दक्षिण भारतीय शैली के वाद्य, पारंपरिक वस्त्र-आभूषण और वेदपाठी ब्राह्मणों द्वारा संस्कृत श्लोकों का सामूहिक गायन वातावरण को आध्यात्मिक बना देता है।

चंदन निर्मित रथ की सवारी मुख्य आकर्षण

ब्रह्मोत्सव के दौरान निकलने वाली चंदन की लकड़ी से निर्मित भव्य रथ यात्रा इस मेले का मुख्य आकर्षण होती है। रथ के निकलते ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है और पूरे क्षेत्र में जयकारों की गूंज सुनाई देती है। इस अवसर पर आकर्षक आतिशबाजी भी की जाती है, जिसे देखने के लिए स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ देश-विदेश से आए पर्यटक भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

देव वाहनों पर निकलती हैं प्रभु की सवारियां

वृंदावन स्थित उत्तर भारत के विशाल रंग मंदिर में आयोजित ब्रह्मोत्सव में प्रतिदिन सुबह और शाम भगवान की सवारी विभिन्न स्वर्ण और रजत निर्मित पारंपरिक देव वाहनों पर निकलती है। इनमें प्रमुख रूप से पुण्यकोठी, सिंह, सूर्य प्रभा, हंस, गरुड़, हनुमान, शेषनाग, कल्पवृक्ष, पालकी, सिंहशार्दूल, काँच का विमान, हाथी, रथ, अश्व, चन्द्रप्रभा और पुष्प विमान शामिल हैं। इन दिव्य वाहनों पर विराजमान होकर भगवान श्री गोदारंगमन्नार श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं।

धूर गोला देता है सवारी का संकेत

वृंदावन में सवारी के उठने और बैठने का पारंपरिक संकेत धूर गोला से दिया जाता है। इसकी आवाज सुनते ही नगरवासी और आसपास के ग्रामीण मंदिर की ओर दौड़ पड़ते हैं, ताकि प्रभु के दर्शन कर सकें। यह परंपरा वर्षों से ब्रज की सांस्कृतिक पहचान बनी हुई है।